काजोल माँ मूवी रिव्यू और कहानी: एक मां अपनी बेटी को बुरी ताकतों से बचाने की कोशिश करती है – यह विचार सुनने में दिलचस्प लगता है, लेकिन फिल्म में उतना असर नहीं छोड़ता। पौराणिकता और कल्पना को मिलाकर बनाई गई यह कहानी डराने में कामयाब नहीं होती।

Highlight
- निर्देशक: विशाल फुरिया (‘छोरी’ फेम)
- प्रोड्यूसर: अजय देवगन, ज्योति देशपांडे, कुमार मंगत पाठक
- मुख्य कलाकार: काजोल, इंद्रनील सेन गुप्ता, रोनित रॉय, दिब्येंदु भट्टाचार्य, खेरिन शर्मा
काजोल माँ मूवी रिव्यू और कहानी: एक मां और दैत्य के बीच डर और बलिदान की कहानी
कहानी पश्चिम बंगाल के चंद्रपुर गांव की है। एक नवजात बच्ची की बलि से शुरू होकर कहानी सीधे 40 साल आगे बढ़ जाती है। शुभांकर (इंद्रनील सेन गुप्ता) अपनी पत्नी अंबिका (काजोल) और 12 साल की बेटी श्वेता (खेरिन शर्मा) के साथ सुखी जीवन जी रहा होता है। तभी उसे अपने पिता की मौत की खबर मिलती है, और वह गांव जाता है। लौटते वक्त किसी शैतानी ताकत की वजह से उसकी मौत हो जाती है।
तीन महीने बाद गांव का सरपंच जायदेव (रोनित बोस रॉय) अंबिका को बुलाता है ताकि वह पुरानी हवेली बेचने का काम कर सके। अंबिका अपनी बेटी श्वेता के साथ गांव जाती है। वहां उन्हें पता चलता है कि हवेली के पीछे एक डरावने पेड़ पर दैत्य का साया है। इसके बाद उनकी ज़िंदगी में डर और रहस्य शुरू हो जाता है। वह दैत्य श्वेता को अपने साथ ले जाना चाहता है। अब सवाल ये है – क्या अंबिका अपनी बेटी को बचा पाएगी? कहानी इसी संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है।
काजोल माँ मूवी का पौराणिक कनेक्शन: देवी काली और रक्तबीज से जुड़ी कहानी
साइवन रिदना क्वाद्रस की लिखी कहानी और स्क्रीनप्ले को देवी काली और रक्तबीज की पौराणिक कथा से जोड़ा गया है। मान्यता है कि देवताओं और राक्षसों के युद्ध के दौरान, जब भी रक्तबीज का खून जमीन पर गिरता था, वहां नए राक्षस पैदा हो जाते थे। ऐसा ही एक बूंद चंद्रपुर गांव में भी गिरती है, जिससे राक्षस की शुरुआत होती है। लेकिन फिल्म में राक्षस और इंसानों के बीच कोई सीधा टकराव या संघर्ष नहीं दिखता, इसी वजह से रोमांच की कमी महसूस होती है।
काजोल माँ मूवी रिव्यू और कहानी: क्लाइमेक्स में दिखी शक्ति, पर बाकी फिल्म रह गई फीकी
‘छोरी’ जैसी हॉरर फिल्म बना चुके विशाल फुरिया इस बार भी एक महिला द्वारा अपनी बेटी को बचाने की कहानी लाते हैं। लेकिन दैत्य की ताकतों के बीच अंबिका के संघर्ष को वह ज्यादा रोचक नहीं बना पाते। यहां भी डर पैदा करने के लिए साउंड इफेक्ट्स का वही पुराना तरीका अपनाया गया है, जो अब असर नहीं छोड़ता। संवाद भी खास प्रभाव नहीं छोड़ते। हालांकि क्लाइमेक्स में एक बेबस मां का देवी काली का रूप लेना असरदार लगता है।
कहानी में कई सवाल अधूरे रह जाते हैं – जैसे अंबिका को देखकर नौकर बिमल (दिब्येंदु भट्टाचार्य) अचानक क्यों बोलने लगता है? या फिर अंबिका को हवेली की अजीब घटनाएं परेशान क्यों नहीं करतीं? इन पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया है, जिससे फिल्म का प्रभाव कमजोर पड़ता है।
फिल्म की जिम्मेदारी काजोल के कंधों पर है, लेकिन उनका किरदार उतना असरदार नहीं बन पाया। उनकी ऑन-स्क्रीन बेटी खेरिन के साथ भावनात्मक जुड़ाव या केमिस्ट्री भी खास नहीं दिखती। रोनित रॉय और इंद्रनील सेन गुप्ता ने अच्छा अभिनय किया है, लेकिन अगर कहानी का लेखन थोड़ा और मजबूत होता, तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी।
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